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गंगा नदी: मोक्षदायिनी या प्रदूषण का केंद्र

Author name:- निधि

“कीरति, मणिति, मेलि सोई।

सुरसरि सम सब कर हितु होई।।”

गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा लिखी गयी इन पंक्तियों का अर्थ है - कीर्ति, कविता और सम्पत्ति वही उत्तम है, जो गंगाजी की तरह सबका हित करने वाली हो, अर्थात् मनुष्य को गंगा की तरह होना चाहिए जो अपना सारा जीवन दूसरों की सहायता करने में न्योछावर कर देती है। 

     पौराणिक मान्यताओं के अनुसार गंगा सतलोक के मानसरोवर में थी। जब राजा भागीरथ ने अपने पूर्वजों को जीवन-मरण के दोष से मुक्त करने के लिए गंगा को पृथ्वी पर लाने की ठानी और उसके लिए उन्होंने कठोर तपस्या शुरू की तब गंगा उनकी तपस्या से प्रसन्न हुईं और उन्होंने कहा कि यदि वो स्वर्ग से पृथ्वी पर गिरेंगीं तो पृथ्वी उनका वेग सहन नहीं कर पाएगी और संपूर्ण पृथ्वी पाताल में चली जाएगी। यह सुनकर भागीरथ सोच में पड़ गए। इसलिए भागीरथ ने भगवान शिव की उपासना शुरू कर दी। उनकी प्रार्थना से शिव जी प्रसन्न हुए और भागीरथ से वर मांगने को कहा। भागीरथ ने अपनी इच्छा शिव जी के समक्ष रखी और जैसे ही गंगा स्वर्ग से उतरीं शिव जी ने उन्हें अपनी जटाओं में कैद कर लिया। उसके बाद शिव जी ने गंगा को एक पोखर में छोड़ दिया जहां से वो सात धाराओं में बंट गईं। तभी से गंगा का एक हिस्सा शिव की जटाओं से निकलता है।

        गंगा भारत की सबसे पवित्र नदी है जो हिमालय के उत्तरीभाग गंगोत्री से निकलकर ऋषिकेश, हरिद्वार, कानपुर, प्रयाग, विंध्याचल, वाराणसी, पाटिलीपुत्र आदि की शोभा बढाती हुई अंत में सुंदरवन के पास बंगाल की खाड़ी में समा जाती है। गंगा के अंचल में ही आयुर्वेद का जन्म हुआ, महानगर कोलकाता इसके किनारे ही विकसित हुआ, राजा राममोहनराय से लेकर दयानंद सरस्वती द्वारा नए सुधार आंदोलन यहीं पर शुरू किये गये जो भारत के ऐतिहासिक धरोवर को प्रदर्शित करते हैं। पृथ्वी पर आकर उसे स्वर्ग बनाने वाली गंगा को भारतवासी अपनी मां की तरह पूजते हैं और प्यार करते हैं।

           गंगा का जल जो धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इतना पवित्र माना गया है कि हर एक पूजा-पाठ में इसका प्रयोग करना शुभ माना जाता है वही गंगाजल आज दिन-प्रतिदिन इतना मैला होता जा रहा है कि आज गंगा दुनिया की छठी सबसे प्रदूषित नदी मानी जाती है। लोगों को मोक्ष दिलाने वाली गंगा का पानी प्रदूषण के कारण काला तो पड़ ही रहा है साथ ही बहाव भी कम होता जा रहा है। गंगा का जलस्तर इस तेजी से गिर रहा है कि पिछले एक वर्ष के भीतर गंगा में ढाई फिट पानी घट गया है। यदि यही स्थिति रही तो गंगा में पानी की मात्रा इतनी कम हो जाएगी कि पीने के लिए पानी का अकाल पड़ सकता है। जिन घाटों पर बैठकर कभी लोग गंगा के निर्मल जल में स्नान कर पापों का नाश किया करते थे उन घाटों से गंगा का जल दूर हो गया है। सिर्फ इतना ही नही, गंगा नदी में ऑक्सीजन की मात्रा भी सामान्य से कम हो गई है। वैज्ञानिक मानते हैं कि गंगा के जल में बैक्टीरियोफेज नामक विषाणु होते हैं, जो जीवाणुओं व अन्य हानिकारक सूक्ष्म जीवों को समाप्त कर देते हैं। किन्तु प्रदूषण के चलते इन लाभदायक विषाणुओं की संख्या में भी काफ़ी कमी आयी है। 

    गंगा प्रदूषित हो रही है यह बात तो सब बोलते हैं लेकिन क्यों हो रही है यह कोई सोचता ही नहीं है। हमारे देश में कुछ लोग आज भी दोहरी मानसिकता में जी रहे हैं। एक ओर गंगा की पवित्रता की बात करते हैं तो दूसरी ओर गंदगी करने का मौका भी नही छोड़ते हैं। बहुत दूर क्यों जाना काशी और वाराणसी घूमने के दौरान मैंने देखा कि लोगों के घरों के सीवर गंगा में सीधे गिर रहे हैं, क्या उन लोगों को पता नहीं है कि गंदगी कहाँ जा रही है? भवन निर्माण के समय निकले अपशिष्ट पदार्थों के निस्तारण पर लोग ध्यान नहीं देते हैं जिसका शिकार नजदीकी नदियाँ और नाले होते हैं। गंगा स्नान के समय घाटों पर मोटे अक्षरों में लिखा होता है कि साबुन,शैम्पू लगाना प्रतिबन्धित है, फिर भी कुछ लोग उसका प्रयोग करते हैं। वेंटिलेटर के बारे में तो सबने सुना ही होगा, स्थापित पत्रकार, लेखक, और पर्यावरणविद्, अभय मिश्रा की किताब "माटी मानुष चून” मे वेंटिलेटर पर ज़िन्दा एक महान नदी की कहानी लिखी गयी है, जानते हैं वह महान नदी कौन है? वह नदी कोई और नही बल्कि हमारी गंगा है। यह किताब गंगा के आने वाले दुर्भाग्य की एक झलक दिखाती हुई कहती है कि यदि भारत की नदियों की अनदेखी हुई तो आगे आने वाले समय में यह पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के हम इंसानों के वेंटिलेटर पर आश्रित हो जाने की कहानी होगी।

          आइये कुछ सवाल हम खुद से पूछते है कि गंगा, डुबकी लगा रहे लाखों लोगों को पाप मुक्त करके भेज रही है या नई बीमारियां देकर? हज़ारों सालों से अमृत बरसाने वाली गंगा नदी आज जहर क्यों परोस रही है? हाल ही में वैज्ञानिकों ने गंगाजल पर किए अपने प्रयोगों में पाया कि गंगा में डायरिया, खूनी पेचिश और टायफायड पैदा करने वाले बैक्टेरिया तेजी से पैदा हो रहे हैं और इन सभी बीमारियों पर अब वो एंटीबायोटिक्स काम नहीं करते जो दस साल पहले आसानी से मरीज को ठीक कर देते थे यह समस्या पूरे गंगापथ को अपने में समेटते हुए बांग्लादेश तक जा रही है। गंगा में मरकरी, सीसा, क्रोमियम और निकल की मात्रा बेहद ज्यादा हो गई है जो त्वचा संबंधी समस्याएं पैदा कर रहे हैं और गॉल ब्लैडर, ग्रास नली और यकृत कैंसर के कारण बन रहे हैं। गंगा में प्रदूषण बढ़ने से जलीय पारिस्थितकीय तंत्र बुरी तरह प्रभावित हुआ है जिसका सीधा असर मछली उत्पादन में भी देखने को मिल रहा है। बंगाली समाज का मुख्य भोजन मछली माना जाता है लेकिन उन्हें यह जानकर आश्चर्य होगा कि बंगाल के लिए मछली की सप्लाई आंध्र प्रदेश करता है क्योंकि बंगाल में मछली गंगा के प्रदूषित जल के कारण खाने योग्य नही रही है। 

             हमारी सरकारों द्वारा गंगा को साफ़ करने के लिए गंगा एक्शन प्लान, नमामि गंगे परियोजना की शुरुवात की गयी और इसके तकरीबन 6 वर्ष बीत चुके है, लेकिन इसके बाद भी आजतक गंगा नदी की सफाई नहीं हो पायी है। ऐसे में सबके मन में एक सवाल जरूर उठता है कि इतनी योजनाएं चलाने के बाद भी क्यों हमारी गंगा आज भी मैली है? क्यों उन योजनाओं को सही तरीके से लागू नहीं किया गया? लेकिन दुख की बात यह है कि सरकार के लिए गंगा नदी मुनाफा कमाने की मशीन मात्र बनाकर रह गई है। गंगा-यमुना आस्था के प्रतीक माने जाते हैं लेकिन दिल्ली चुनाव हो या केंद्र चुनाव, इसको अपने घोषणापत्र में एक अहम मुद्दा बनाकर लोगों की धार्मिक आस्था के साथ खेला जाता है। गंगा बेहतरी के नाम पर उत्तर प्रदेश की शासकीय गंगा यात्रा भले ही जारी हो किन्तु प्रयागराज में कुंभ के मेले के समय में गंगा-यमुना में जा रहे नाले के सोशल मीडिया पर जारी ताज़ा वीडियो के दृश्य कुछ और ही कहते हैं। 

          

          अंत में एक सवाल जिसका जवाब हर कोई जानना चाहता कि गंगा नदी का भविष्य क्या है? क्या वर्तमान सरकार और गंगा को साफ करने के लिए बनाई गई सभी एजेंसियां अपना फायदा छोड़कर पिछले वर्षों की विफलताओं और गलतियों से कुछ सीखेंगे या जिस नदी को ऋषि मुनियों ने माता के रूप में पूजा वह नदी भी सरस्वती नदी की तरह विलुप्त हो जायेगी? गंगा नदी की अगर यही स्थिति रही तो तीसरा विश्वयुद्ध पानी को लेकर होगा। गंगा अविरल धारा न रहकर मानव निर्मित नदी बन जाएगी जिस पर बैराज होंगे, जिसकी धारा को सरकार अपनी जरूरतों के अनुसार बदलती रहेगी और आखिर में वह एक मानव निर्मित नदी के रूप में बदल जायेगी, जिसे देशवासी गंगा कहते हैं। अब एक सवाल मैं आप लोगों के लिए छोड़ रही हूँ कि हमें गंगा नदी को क्या बनाना है समस्त पापों को नष्ट करने वाली मोक्षदायिनी गंगा या लोगों को बीमारी देने वाली प्रदूषित गंगा?