स्वमूल्यांकन
Author name:- गौरव कुमार घोष
काल-चक्र की गति पर कभी-कभी संदेह होता है, अन्यथा इतनी जल्दी एक पूरे वर्ष का अंत होना अचंभित नहीं करता? पूरे साल भर हम दौड़ते रहे, अब पूस की कड़कड़ाती ठंड में चलिए थोड़ी बातें की जाएँ। सर्वप्रथम, आज का युवा काफ़ी परेशान रहता है—कभी अपनी पढ़ाई को लेकर, कभी अपने स्वास्थ्य को लेकर। अक्सर रात भर हमें आगामी समय के ख़ौफ़ ने जगा के रखा, तो कभी अतीत की चीख़ों ने हमें भय-संत्रस्त किया। इन्हीं परेशानियों के सागर में हम साल-भर डूबते रहे हैं।
कितने ही काम थे इस साल, जो करने बाकी रह गए। कुछ अनकही बातें भी रह गईं, जो अगर कह लेते तो बात कुछ और हो सकती थी। सारे अधूरे, असमाप्त, विफल कार्यों के प्रेतों ने हमें भयभीत कर रखा है। आज के युवा को अक़्सर यही अजीब अफ़सोस की भावना द्रवित करती है।
हम्म… एक हल्की साँस लेकर सोचते हैं। तनिक गौर किया जाए कि क्या यह साल वाक़ई अर्थहीन रहा है? कदापि नहीं। तो फिर यह मन इतना विचलित क्यों है? किस बात की छुरी इस मानस-पटल को चीर रही है? लोग इसे पश्चाताप की संज्ञा देंगे। कहेंगे—मैं और भी बहुत कुछ कर सकता था, मगर मैंने कामचोरी की, धिक्कार है! परंतु ख़ुद को दोषारोपित करने से क्या बीता वक़्त लौटेगा? यदि नहीं, तो इस हीनभाव से मुक्त क्यों नहीं हो पा रहे हैं हम?
आजकल की दुनिया में शायद असफलता और उससे फैले अवसाद को हम अधिक महत्त्व देने लगे हैं। यह उदासी यथार्थ का चोला ओढ़कर निराशावाद का प्रचार-स्रोत बन बैठी है, जबकि हमारा रवैया इसके ठीक विपरीत होना चाहिए।
एक दार्शनिक दृष्टिकोण से देखें तो चीज़ें थोड़ी साफ़ होती हैं। जब-जब इच्छाकृत घटनाएँ हमारे साथ घटित होती हैं, हम तब ख़ुश होते हैं, सवाल नहीं करते। परंतु ज़रा-सी बात बिगड़ी और हमारा रोना शुरू हो जाता है। ग़ौर से सोचें तो यह जो घुटन हमें महसूस हो रही है, कहीं उसके पीछे हमारी सफल होने की लालसा का स्वार्थ तो नहीं?
अवश्य।
हम सदा ख़ुद को एक बेहतर ओहदे पर देखना चाहते हैं। और यह एक सकारात्मक परिकल्पना भी है, जिससे हमारे माता-पिता, भाई-बहन, शिक्षकों और मित्रों का गौरव बढ़ता है। अपने दिल पर हाथ रखकर विचार कीजिए—हमारे सारे बेहतरी के प्रयत्न अपने से बढ़कर दूसरों की ख़ुशियों हेतु होते हैं। अतः हम सिर्फ़ ख़ुद से नहीं, बाक़ियों को ख़ुश न कर पाने के बोझ से भी दबे हुए हैं।
इसी रोग का बहुत ही साधारण उपचार है, और वह है—स्वयं से ईमानदारी। अगर हम स्वयं को धोखा देने का प्रयत्न करेंगे, अंततः हमारी ही क्षति होगी। चाहे अभियंत्रिकी की पढ़ाई में, क्लब वग़ैरह के कार्यभार में अथवा आगामी करियर की तैयारी में—सर्वदा ख़ुद से ईमानदारी बरकरार रखनी होगी। स्वयं से जो यह हमारा वैमनस्य है, उससे मुक्ति का यही एकमात्र उपाय है।
और ऐसा नहीं है कि बीते साल हमने कुछ अच्छा नहीं किया। किया है। इतने बड़े हुए हैं, ज़िम्मेदार हुए हैं। हमने कितने ही ख़ुशी के पल सँजोए हैं—उन सुन्दर पलों का भी तो मोल है। चाहे दोस्तों के साथ मज़े किए हों या कोई बेहद लज़ीज़ पकवान खाया हो—ये तो हमने जीवन भर की सुखद स्मृतियाँ बटोरी हैं। छोटी नाकामियों पर इतना शोक है, तो इतनी ख़ुशियों पर तनिक मुस्कराना भी बनता है।
बहरहाल, अब एक नव वर्ष दरवाज़े पर दस्तक दे रहा है। तो चलिए—इस साल का वरण एक आशावादी उम्मीद से करते हैं। नई कैलेंडर लगाने के अतिरिक्त छोटे-छोटे सुधार के वादे भी हम करेंगे, ख़ुद की बेहतरी के लिए। शायद कोई वाद्ययंत्र सीख लें या फिर DSA की प्लेलिस्ट पूरी की जाए? अगणित करने योग्य काम पड़े हैं, तो चलिए उन्हें एक मुकम्मल ठिकाने तक पहुँचाया जाए। परंतु इस बार, ईमानदारी के साथ…
नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ!
